अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला को लेकर अचानक सख्त रुख अपनाते हुए ऐसा कदम उठाया है, जिसे वैश्विक राजनीति में रूस और चीन के लिए बड़ा संदेश माना जा रहा है। ट्रंप कोरोलरी के तहत अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्ध में अपनी दखल नीति को और आक्रामक बना दिया है। इसका सीधा असर लैटिन अमेरिका की राजनीति के साथ-साथ वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनके करीबियों पर दबाव बढ़ाते हुए कार्रवाई तेज की है। इसका मकसद वेनेजुएला में चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकना बताया जा रहा है। अमेरिका लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि मादुरो सरकार चीन और रूस के समर्थन से सत्ता में बनी हुई है और यह पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी हितों के खिलाफ है।
ट्रंप कोरोलरी असल में 19वीं सदी की मोनरो डॉक्ट्रिन का विस्तार मानी जाती है, जिसके तहत अमेरिका यह साफ कर चुका है कि वह पश्चिमी गोलार्ध में किसी बाहरी ताकत की दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं करेगा। वेनेजुएला पर दबाव बनाकर अमेरिका ने यह संकेत दे दिया है कि वह चीन-रूस के प्रभाव को जड़ से खत्म करने के मूड में है।
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भारत पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम का भारत पर सीधा नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। वेनेजुएला तेल उत्पादन का बड़ा केंद्र है और भारत वहां से कच्चा तेल आयात करता रहा है। यदि अमेरिका-वेनेजुएला तनाव बढ़ता है या प्रतिबंध और सख्त होते हैं, तो इसका असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ सकता है, जिससे भारत की ऊर्जा लागत प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा, भारत अमेरिका, रूस और चीन—तीनों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखने की नीति पर चलता है। ऐसे में वैश्विक ध्रुवीकरण बढ़ने से भारत की कूटनीतिक चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं। फिलहाल भारत स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए है।
