देश की राजनीति में इन दिनों ‘बाभन’ समाज को लेकर नई बहस तेज हो गई है। यह समाज न खुद को पूरी तरह ब्राह्मण मानता है और न ही पारंपरिक रूप से भूमिहार पहचान से जुड़ा हुआ है। इसी अलग पहचान के कारण बाभन समाज सरकार से अपनी एक खास लड़ाई लड़ रहा है। समाज का कहना है कि वे लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहे हैं।

बाभन समाज के नेताओं का आरोप है कि उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ती है। एक ओर उन्हें सवर्ण वर्ग की तरह देखा जाता है, जिससे आरक्षण या विशेष योजनाओं का लाभ नहीं मिलता। दूसरी ओर, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी सुविधाओं में भी उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसी वजह से समाज अब अपनी अलग पहचान और अधिकारों की मांग को लेकर खुलकर सामने आ गया है।

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बाभन समाज की आबादी कई इलाकों में निर्णायक मानी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी सीटों तक, यह समाज चुनावी गणित को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि चुनाव के समय राजनीतिक दल बाभन समाज को साधने की कोशिश करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी मांगें पीछे छूट जाती हैं।

हाल के समय में बाभन समाज ने संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद की है। जगह-जगह बैठकें, धरना-प्रदर्शन और ज्ञापन दिए गए हैं। सोशल मीडिया के जरिए भी समाज अपने मुद्दों को मजबूती से उठा रहा है। उनकी प्रमुख मांगों में सामाजिक मान्यता, राजनीतिक भागीदारी और सरकारी योजनाओं में समान अवसर शामिल हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकार ने समय रहते बाभन समाज की मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो इसका असर आगामी चुनावों में दिख सकता है। कई सीटों पर बाभन समाज का वोट पावर जीत और हार का अंतर तय कर सकता है। ऐसे में यह संघर्ष सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि पूरी तरह राजनीतिक रूप भी ले चुका है।

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अब बड़ा सवाल यह है कि सरकार इस बढ़ते असंतोष को कैसे संभालती है। अगर संवाद और समाधान का रास्ता नहीं निकला, तो बाभन समाज की यह लड़ाई आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।

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