बंगाल की राजनीति इन दिनों बेहद गर्म है। वक्फ कानून और SIR (सीयर्स इमीडिएट रिपोर्ट) को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तेवर बदले हुए दिख रहे हैं। कई महीनों तक केंद्र सरकार और विपक्ष पर तीखे हमले करने वाली TMC अब इन मुद्दों पर नरमी बरतती नजर आ रही है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है प्रदेश का मुस्लिम वोट बैंक—जो करीब 27 प्रतिशत है और लगभग 100 से ज्यादा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है।

क्यों बदला रुख?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि TMC चुनावी जोखिम नहीं लेना चाहती। विरोध बढ़ने की स्थिति में मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा कांग्रेस या इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) की ओर झुक सकता है। इसलिए पार्टी दो मोर्चों पर संतुलन बना रही है—एक तरफ हिंदू वोटरों को नाराज न करना और दूसरी तरफ मुस्लिम वोट बैंक को संभालकर रखना।
वक्फ कानून पर सॉफ्ट स्टैंड
जहां पहले TMC वक्फ कानून में संशोधन को लेकर केंद्र पर लगातार हमला बोल रही थी, वहीं अब ममता सरकार ने बयानबाजी कम कर दी है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि राज्य वक्फ बोर्ड की समस्याओं का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाएगा।
SIR पर क्यों घिरी TMC?
SIR लागू होने के बाद विपक्ष का आरोप है कि TMC मुस्लिम समुदाय को लेकर दिखावे की राजनीति कर रही है। कई जगहों पर लोगों के नाम मतदाता सूची से कटने की शिकायतें भी सामने आईं, जिसका फायदा BJP उठाने में लगी है। इस बीच ममता बनर्जी का सॉफ्ट रवैया सवाल खड़े कर रहा है कि पार्टी किस दिशा में जा रही है।
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आने वाले चुनावों पर सीधा असर
बंगाल की मौजूदा स्थिति ऐसी है कि TMC जरा-सी ढिलाई भी नहीं बरदाश्त कर सकती। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि 2026 के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम वोट तय करेंगे कि TMC सत्ता में लौटेगी या नहीं। यही वजह है कि पार्टी तलवार की धार पर चल रही है—नरमी भी दिखा रही है और विरोध भी नहीं छोड़ रही।
