Bareilly, Uttar Pradesh. भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI), बरेली के 11वें दीक्षांत समारोह में सोमवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक ऐसा भावनात्मक बयान दिया जिसने सभागार में मौजूद सभी लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा कि वह जानवरों को ‘पशु’ कहे जाने को उचित नहीं मानतीं और उनके लिए ‘जीवन धन’ शब्द का इस्तेमाल करती हैं। उनका कहना था कि इंसान और जानवरों का रिश्ता केवल सेवा या उपयोग का नहीं, बल्कि जीवन का सह-अस्तित्व है — जिसे शब्दों की गरिमा से समझा जाना चाहिए।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि जानवरों के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है। “हमारे जीवन में पशु सिर्फ उपयोग की वस्तु नहीं हैं, बल्कि वे हमारी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और भावनाओं का अहम हिस्सा हैं। इसलिए मैं मानती हूं कि उन्हें ‘पशु’ कहना शायद उचित नहीं है। वे हमारे ‘जीवन धन’ हैं,” उन्होंने कहा।

इस अवसर पर IVRI के छात्र, शिक्षक, पशु चिकित्सक, शोधकर्ता और गणमान्य अतिथि मौजूद थे। राष्ट्रपति मुर्मू का यह बयान न केवल अकादमिक दृष्टि से अहम रहा, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक स्तर पर भी गूंजता नजर आया।
उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में, जहां गाय, बैल, हाथी और घोड़े आदि न केवल खेतों में काम करने वाले सहायक रहे हैं बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से पूजनीय भी हैं, वहां जानवरों को ‘पशु’ जैसे शब्दों से संबोधित करना एक सीमित सोच को दर्शाता है।
राष्ट्रपति मुर्मू ने पशु चिकित्सा के छात्रों को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि “आप लोग न केवल जानवरों का इलाज करते हैं, बल्कि एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं — एक ऐसे जीवधारी की सेवा करना जो न बोल सकता है, न अपनी तकलीफ खुद कह सकता है।”
उन्होंने पशु चिकित्सा को “करुणा आधारित विज्ञान” बताया और कहा कि यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक मानवीय कर्तव्य है। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे अपने ज्ञान और सेवा के भाव को केवल डिग्री तक सीमित न रखें, बल्कि गांव-गांव जाकर लोगों को जानवरों की सेहत, पोषण और देखभाल के प्रति जागरूक करें।
राष्ट्रपति ने यह भी रेखांकित किया कि पशुपालन भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ है। “ग्रामीण भारत की आजीविका का एक बड़ा हिस्सा गाय, भैंस, बकरी, मुर्गी और अन्य जानवरों पर आधारित है। ये केवल दूध या मांस के स्रोत नहीं हैं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का माध्यम भी हैं। जब खेती संकट में होती है, तब यही जीवन धन परिवारों का सहारा बनते हैं।”
समारोह में मौजूद छात्रों और शोधकर्ताओं को राष्ट्रपति ने संदेश दिया कि विज्ञान और मानवीय संवेदना का संतुलन ही किसी डॉक्टर — विशेषकर पशु चिकित्सक — की असली पहचान है। उन्होंने कहा कि “आज के समय में जब पर्यावरण संकट, जैव विविधता का क्षरण और ज़ूनोटिक बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, तब पशु चिकित्सा का महत्व और बढ़ गया है।”
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पशु चिकित्सा शिक्षा में नैतिक शिक्षा, पारंपरिक ज्ञान और जनजातीय समुदायों के पशु-आधारित अनुभवों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इससे न केवल छात्रों का दृष्टिकोण व्यापक होगा, बल्कि वे समाज से बेहतर रूप से जुड़ पाएंगे।
इस मौके पर राष्ट्रपति ने संस्थान के उन छात्रों को भी सम्मानित किया जिन्होंने अकादमिक उत्कृष्टता हासिल की थी। उन्होंने IVRI की रिसर्च परियोजनाओं की सराहना करते हुए कहा कि संस्थान ने देश को न केवल अच्छी तकनीक दी है, बल्कि जानवरों की सेवा को भी सम्मानजनक स्थान दिलाया है।
पशु चिकित्सा विज्ञान के भविष्य पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि “अब समय आ गया है कि हम सिर्फ इलाज से आगे बढ़कर पशु कल्याण, उनके मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गरिमा पर भी चर्चा करें। एक स्वस्थ समाज केवल इंसानों से नहीं बनता, उसमें जानवरों का भी बराबर योगदान है।”
उनके इस उद्बोधन पर IVRI के निदेशक और कर्मचारियों ने आभार व्यक्त किया और कहा कि यह संस्थान के लिए गर्व की बात है कि देश की प्रथम नागरिक ने न केवल छात्रों को मार्गदर्शन दिया बल्कि पशु चिकित्सा के मानवीय पहलू को भी उजागर किया।
अंत में, राष्ट्रपति ने एक भावुक अपील करते हुए कहा, “जब भी आप किसी जानवर को देखें, तो उसमें केवल एक शरीर मत देखिए, उसमें एक जीवंत आत्मा को महसूस कीजिए। यही भावना हमें सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाती है।”
उनका यह विचारशील और संवेदनशील वक्तव्य न केवल छात्रों और शिक्षकों के दिलों को छू गया, बल्कि देशभर में पशु कल्याण के प्रति सोच को एक नई दिशा देने का कार्य भी करेगा।
