पटना। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सियासी समीकरण गर्मा गए हैं। विपक्षी दलों के महागठबंधन (INDIA गठबंधन) में पहले से ही छह राजनीतिक दल शामिल हैं, और अब चर्चा जोरों पर है कि क्या आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को भी इस गठबंधन में शामिल करेंगे?

ताजा जानकारी के मुताबिक, बिहार की कुल 243 विधानसभा सीटों में से 196 सीटों की मांग पहले से ही गठबंधन के अंदर से आ चुकी है। ऐसे में अगर ओवैसी की पार्टी को भी शामिल किया जाता है, तो सीट बंटवारे को लेकर घमासान और बढ़ सकता है।
फिलहाल महागठबंधन में राजद, कांग्रेस, वाम दल (सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई एमएल), विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) शामिल हैं। हर पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अधिक सीटें चाहती है।
राजनीतिक सूत्रों की मानें तो ओवैसी की पार्टी AIMIM सीमांचल क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए हुए है। 2020 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि, बाद में चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए थे।
अब सवाल यह है कि क्या लालू यादव ओवैसी को दोबारा मौका देंगे, खासकर तब जब सीमांचल में मुस्लिम वोट बैंक को लेकर सीधी टक्कर है?
कई विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी की पार्टी को महागठबंधन में लाना ध्रुवीकरण को रोकने की रणनीति भी हो सकती है। इससे भाजपा को सीमांचल में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का मुद्दा भुनाने से रोका जा सकता है।
हालांकि, गठबंधन के भीतर मौजूद कुछ दल ओवैसी की एंट्री से असहज नजर आ रहे हैं। खासकर कांग्रेस और वाम दलों के बीच मतभेद की संभावना जताई जा रही है। इन दलों को लगता है कि ओवैसी की राजनीति, सेकुलर छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।
वहीं, आरजेडी सूत्रों के मुताबिक, लालू प्रसाद यादव किसी भी निर्णय से पहले सीटों के संतुलन और वोट ट्रांसफर की संभावना को देख रहे हैं। उनका मकसद भाजपा को हराने के लिए हर उपयोगी साथी को साथ लेना है।
गौरतलब है कि भाजपा ने भी सीटों पर मंथन तेज कर दिया है। एनडीए के घटक दलों के बीच भी तालमेल की कोशिशें चल रही हैं। ऐसे में महागठबंधन में बढ़ती भीड़ और सीटों की मारामारी, विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा ज़ोर पकड़ रही है कि क्या ओवैसी को सीमांचल की कुछ चुनिंदा सीटें देकर महागठबंधन में शामिल किया जाएगा, या फिर उन्हें बाहर रखकर भाजपा के खिलाफ ‘ध्रुवीकृत मुकाबला’ लड़ा जाएगा।
बिहार चुनाव की तारीखों का ऐलान अब कुछ ही हफ्तों में हो सकता है। उससे पहले विपक्ष को स्पष्ट रणनीति और एकजुटता दिखानी होगी। अन्यथा सीटों को लेकर अंदरूनी खींचतान भाजपा के लिए एक और मौका साबित हो सकती है।
