चंडीगढ़ | 14 जून 2025
पंजाब की सियासत में एक बार फिर हलचल देखने को मिली जब शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के पूर्व वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री सिकंदर सिंह मलूका ने शनिवार को औपचारिक रूप से पार्टी में वापसी की घोषणा की। पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने खुद उन्हें दोबारा पार्टी में शामिल कर ‘घरेलू विवाद’ को समाप्त करने का संकेत दिया।

पिछले एक साल से पार्टी से बाहर चल रहे मलूका कभी बादल परिवार के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे। लेकिन मतभेदों के चलते वे ‘सुधार लहर’ नामक बागी गुट से जुड़ गए थे, जिसे बाद में अकाल तख्त जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह के निर्देश पर दिसंबर 2024 में भंग कर दिया गया।

मलूका की वापसी: क्यों है यह राजनीतिक रूप से अहम?

मलूका की घरवापसी को शिअद के लिए एक बड़ा सियासी संकेत माना जा रहा है।
वह 28 वर्षों तक बठिंडा जिला अध्यक्ष रहे हैं और राज्य में उनकी मजबूत पकड़ रही है। एक समय पर वे अकाली दल के ‘ग्रासरूट’ नेटवर्क के मजबूत स्तंभ माने जाते थे।

हालांकि, पिछले साल उनके बेटे गुरप्रीत सिंह मलूका और बहू परमपाल कौर सिद्धू द्वारा भाजपा में शामिल होने और फिर लोकसभा चुनाव में हरसिमरत कौर बादल के खिलाफ चुनाव लड़ने ने पार्टी में तनाव पैदा कर दिया था।

सियासी पृष्ठभूमि: कैसे हुई दूरी?

सिकंदर सिंह मलूका को अप्रैल 2024 में मौर विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी पद से हटाया गया और उनकी जगह जनमेजा सिंह सेखों को नियुक्त किया गया। इसके बाद ही उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद खुलकर सामने आए।

उन्होंने खुलासा किया था कि उन्होंने अपने बेटे और बहू को भाजपा में जाने से रोकने की कोशिश की थी, लेकिन वे उन्हें रोक नहीं सके।
इसके तुरंत बाद वे ‘सुधार लहर’ से जुड़ गए, जो शिअद के भीतर ही एक असंतुष्ट धड़ा था, लेकिन उसकी उम्र ज्यादा लंबी नहीं रही।

सुखबीर सिंह बादल का बयान

पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा,
“मलूका साहब ने हमेशा पार्टी और पंथ के लिए काम किया है। कुछ मतभेद जरूर थे, लेकिन अब सब साफ हो चुका है। वह दोबारा पार्टी का हिस्सा हैं, और हम उनके अनुभव का लाभ उठाएंगे।”

पार्टी सूत्रों का मानना है कि मलूका को दोबारा संगठनात्मक जिम्मेदारी भी मिल सकती है, खासकर बठिंडा और मौर क्षेत्र में जहां उनका अब भी मजबूत आधार है।

मलूका ने क्या कहा?

पार्टी में वापसी के दौरान मलूका ने कहा,
“मैं हमेशा से अकाली दल का सिपाही रहा हूं। जो गलतफहमियां थीं, उन्हें पीछे छोड़कर अब एकजुट होकर आगे बढ़ने का वक्त है।”
उन्होंने यह भी कहा कि वे अब अपने परिवार की राजनीतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, लेकिन पंथ और पार्टी की सेवा जारी रखेंगे।

क्या है इसका चुनावी असर?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मलूका की वापसी शिअद को विशेष रूप से बठिंडा और मालवा बेल्ट में फिर से मजबूत कर सकती है।
यह क्षेत्र भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच खिंचती हुई सियासी रेखाओं के बीच संतुलन बनाने के लिए अकाली दल को सहारा दे सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार,
“अगर शिअद 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए क्षेत्रीय चेहरों को फिर से साथ लाती है, तो मलूका जैसे वरिष्ठ नेताओं की वापसी से पार्टी को संगठनात्मक मजबूती मिल सकती है।”

बहू का भाजपा प्रेम, पार्टी के लिए बना था सिरदर्द

पूर्व IAS अधिकारी परमपाल कौर सिद्धू, जो सिकंदर सिंह मलूका की बहू हैं, ने 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा से टिकट लेकर बठिंडा से अकाली उम्मीदवार हरसिमरत कौर बादल के खिलाफ चुनाव लड़ा था।
हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पार्टी के अंदर इससे नाराजगी बढ़ी और मलूका को इसके लिए ज़िम्मेदार माना गया।

लेकिन मलूका ने साफ कहा था कि उन्होंने अपने बेटे और बहू के फैसले का समर्थन नहीं किया था और उनकी निजी राजनीतिक पसंद को रोकने की पूरी कोशिश की थी।

सुधर लहर की समाप्ति और वापसी की राह

‘सुधार लहर’ नामक बागी गुट में जुड़ने के बाद मलूका को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निलंबित कर दिया गया था।
दिसंबर 2024 में जब अकाल तख्त से इसकी समाप्ति का निर्देश आया, तो उसके बाद ही मलूका ने पार्टी से संपर्क साधना शुरू किया।
करीबी सूत्रों के मुताबिक, पिछले कई हफ्तों से उनकी सुखबीर बादल से बातचीत चल रही थी, जो अब रंग लाई।

पार्टी में फिर बिखरेगी चमक?

पार्टी सूत्रों का कहना है कि मलूका को एक बार फिर मौर विधानसभा क्षेत्र या बठिंडा संगठन में कोई जिम्मेदारी मिल सकती है।
हालांकि इसकी आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है, लेकिन माना जा रहा है कि आगामी संगठनात्मक बदलावों में उनका नाम प्रमुखता से शामिल रहेगा।

निष्कर्ष:

सिकंदर सिंह मलूका की शिअद में वापसी न सिर्फ एक वरिष्ठ नेता की ‘घर वापसी’ है, बल्कि अकाली दल की रणनीतिक मजबूती की भी शुरुआत मानी जा रही है।
2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह कदम पार्टी के लिए एक सकारात्मक संकेत हो सकता है, जो मालवा बेल्ट में उसके खोते जनाधार को फिर से पाने की दिशा में अहम साबित होगा।

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