कोलकाता।
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। इस बार विवाद की वजह है राज्य सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की लिखी गई 19 किताबों को अनिवार्य रूप से शामिल करने का आदेश। राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग ने सभी जिला विद्यालय निरीक्षकों (DIs) को निर्देश दिया है कि सरकारी स्कूलों के पुस्तकालयों में 515 किताबें अनिवार्य रूप से रखी जाएं, जिनमें ममता बनर्जी द्वारा लिखित पुस्तकें भी शामिल हैं।

यह आदेश सामने आते ही राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। जहां भाजपा और शिक्षक संगठन इस कदम की आलोचना कर रहे हैं, वहीं तृणमूल कांग्रेस इसे “नेतृत्व और साहित्य के सम्मान” की बात कहकर सही ठहरा रही है।

📚 क्या है सरकार का आदेश?

राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी एक आधिकारिक निर्देश में कहा गया है कि सभी सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों को 515 पुस्तकों का संग्रह अपने पुस्तकालयों में करना होगा। इस सूची में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा लिखी गई 19 किताबें भी शामिल हैं, जिन्हें अब सभी स्कूलों में खरीदा जाना अनिवार्य होगा।

शिक्षा आयुक्त ने सभी DIs को निर्देश दिया है कि वे स्कूल प्रमुखों को इस आदेश का पालन सुनिश्चित कराएं और रिपोर्ट विभाग को सौंपें।

🧑‍🏫 शिक्षक संघों ने जताई आपत्ति

पश्चिम बंगाल के शिक्षक संगठनों ने इस निर्णय पर नाराज़गी जताते हुए कहा है कि स्कूलों में साहित्यिक गुणवत्ता, पाठ्यक्रम अनुकूलता और छात्रों की रुचि को ध्यान में रखकर किताबें चुनी जानी चाहिए, न कि राजनीतिक व्यक्तित्व को बढ़ावा देने के लिए।

एक वरिष्ठ शिक्षक नेता ने कहा:

“बच्चों की शिक्षा में किसी नेता के प्रचार की जगह नहीं होनी चाहिए, चाहे वो कोई भी हो। स्कूलों का उद्देश्य शिक्षा है, न कि विचारधारा थोपना।”

🗣 भाजपा का हमला – प्रचार और भ्रष्टाचार का नया तरीका?

भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ट्वीट कर लिखा:

“चुनाव से पहले काले धन को सफेद करने का एक और तरीका? ममता बनर्जी अब स्कूलों के पुस्तकालयों का राजनीतिक मुद्रीकरण कर रही हैं। यह शिक्षा में प्रचार घुसाने का प्रयास है। हम चुप नहीं बैठेंगे।”

भाजपा ने आरोप लगाया कि यह कदम लोकतंत्र और शिक्षा की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है और इससे छात्रों का भविष्य खतरे में डाला जा रहा है।

🟢 TMC का जवाब – “साहित्य को राजनीति से न जोड़ें”

तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ममता बनर्जी एक साहित्यकार भी हैं, और उनकी किताबों में कविता, समाजिक सोच और मानवीय मूल्यों की बात की गई है। पार्टी ने कहा कि यह साहित्यिक पुस्तकें हैं, प्रचार का माध्यम नहीं।

TMC प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा:

“ममता बनर्जी को साहित्य अकादमी से भी सम्मान मिल चुका है। उनकी किताबें बच्चों को प्रेरणा देने वाली हैं। यह किसी भी तरह का राजनीतिक प्रचार नहीं है।”

💸 क्या है फंडिंग का मामला?

सूत्रों के मुताबिक, इन किताबों की खरीद सरकारी बजट या स्कूल विकास निधि से की जाएगी। भाजपा ने इसे लेकर “करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग” बताया है और एक श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है कि कितनी कीमत पर यह किताबें खरीदी जाएंगी और किन पब्लिशर्स को इसका फायदा होगा।

🔍 क्या कहता है शिक्षा नीति का विशेषज्ञ वर्ग?

शिक्षाविद् और नीति विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य सरकारों को पुस्तक चयन में पारदर्शिता बरतनी चाहिए। स्कूलों की लाइब्रेरी में राजनीतिक नेताओं की किताबों को शामिल करने से निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।

डॉ. शांति घोष, शिक्षा नीति विशेषज्ञ, कहती हैं:

“यदि कोई पुस्तक साहित्यिक मूल्य की हो, तो उसका चयन होना चाहिए, लेकिन यह काम शिक्षा बोर्ड या स्वतंत्र समीक्षकों के जरिए होना चाहिए, न कि सत्ता पक्ष की सिफारिश से।”

🔚 निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल में स्कूलों में ममता बनर्जी की किताबों की अनिवार्यता को लेकर उठी बहस इस बात की ओर इशारा करती है कि शिक्षा का राजनीतिकरण आज भी देश के कई हिस्सों में गंभीर मुद्दा बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस पर पुनर्विचार करती है या विपक्षी दबाव को नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ती है।

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