नई दिल्ली, 2 जुलाई 2025: इटालियन लग्ज़री ब्रांड Prada के ₹1.2 लाख के “कोल्हापुरी चप्पल” को लेकर भारत में एक नया सांस्कृतिक विवाद खड़ा हो गया है। पारंपरिक भारतीय फुटवियर को ‘डिज़ाइनर ट्विस्ट’ देकर पेश करने और भारी कीमत वसूलने पर सोशल मीडिया से लेकर हस्तशिल्प समुदाय तक,

हर कोई सवाल कर रहा है – क्या भारतीय कारीगरी की कद्र सिर्फ विदेशी मुहर के बाद ही होती है?

भारत को लगभग 3,000 पारंपरिक शिल्प कलाओं का घर माना जाता है। लेकिन यही सच्चाई भी है कि हममें से अधिकांश लोग इनकी कदर नहीं करते। आज़ादी के इतने दशकों बाद भी देश के अधिकांश दस्तकार गुमनामी और आर्थिक तंगी में जीवन बिता रहे हैं। यह दुखद है कि जिस कोल्हापुरी चप्पल को महाराष्ट्र और कर्नाटक के सीमावर्ती इलाकों के कारीगर पीढ़ियों से बनाते आ रहे हैं, वह आज़ भी हाशिए पर है – न मीडिया में उसकी चर्चा होती है, न बाज़ार में उसे कीमत मिलती है।

ऐसे में जब Prada जैसी विदेशी ब्रांड ने इसी पारंपरिक डिज़ाइन को हाई-फैशन कैटवॉक में लाकर ₹1.2 लाख में बेचना शुरू किया, तो भारतीयों की भावनाएं आहत होना लाजमी था। सवाल यह नहीं है कि प्राडा ने चप्पल क्यों बनाई या बेची, बल्कि यह है कि हमने अपने ही शिल्प को इतना नज़रअंदाज़ क्यों किया कि उसे पहचान दिलाने के लिए विदेशी ब्रांड की ज़रूरत पड़ी?

इस विवाद ने न केवल सोशल मीडिया पर लोगों को झकझोरा, बल्कि एक बार फिर भारत की हस्तशिल्प नीतियों, संरक्षण प्रयासों और सांस्कृतिक आत्म-सम्मान पर बहस छेड़ दी है। “जब भारतीय कारीगर वही चप्पल ₹500 में बनाता है तो उसका कोई ग्राहक नहीं, लेकिन जब उस पर ‘Prada’ लिखा हो, तो वही चप्पल ₹1.2 लाख में बिकती है?” – यही सवाल सबसे ज़्यादा गूंज रहा है।

दूसरी ओर, कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि प्राडा के इस कदम से कोल्हापुरी चप्पल को वैश्विक पहचान मिली है। पुणे स्थित Chappers ब्रांड के संस्थापक हर्षवर्धन पाटवर्धन का कहना है कि प्राडा विवाद के बाद उनके बिजनेस में 30–40% की बिक्री वृद्धि हुई है और सोशल मीडिया ट्रैफिक में 400% तक उछाल आया है।

इससे यह भी साबित होता है कि भारतीय दस्तकारी को यदि सही प्लेटफॉर्म मिले, तो वह दुनिया में जगह बना सकती है। लेकिन यह पहल हमें खुद करनी होगी – सरकारी स्तर पर भी और जनसामान्य के रूप में भी।

कोल्हापुरी चप्पल का इतिहास 800 साल पुराना माना जाता है और इसे मुख्यतः शुद्ध चमड़े से हाथ से बनाया जाता है। इसे बनाने में पारंपरिक कारीगरों को घंटों की मेहनत लगती है, लेकिन उन्हें मिलती है सिर्फ कुछ सौ रुपयों की मज़दूरी। ऐसे में जब एक विदेशी ब्रांड उसी डिजाइन को लाखों में बेचता है, तो यह सिर्फ व्यावसायिक नहीं, बल्कि नैतिक बहस भी बन जाती है।

प्राडा की वेबसाइट पर यह चप्पल “बोल्ड लेदर स्लाइड ऑन सैंडल्स” के नाम से दर्ज है और इसे भारतीयों की भावनाओं से जोड़कर नहीं, बल्कि स्टाइल स्टेटमेंट के रूप में पेश किया गया है।

यह पूरी घटना भारत में “कल्चरल एप्रोप्रियेशन” (सांस्कृतिक अपनाने) बनाम “कल्चरल सेलिब्रेशन” (सांस्कृतिक सम्मान) की बहस को जन्म देती है। क्या यह सराहना है या शोषण? क्या प्राडा जैसे ब्रांड को स्थानीय कारीगरों को भी इसका आर्थिक लाभ देना चाहिए?

कई हस्तशिल्प प्रेमियों और फैशन एक्सपर्ट्स ने सुझाव दिया है कि भारतीय सरकार को GI टैग वाले उत्पादों (जैसे कोल्हापुरी) के प्रचार-प्रसार और निर्यात के लिए खास रणनीति बनानी चाहिए। साथ ही, ऐसे ब्रांड्स को भारतीय कारीगरों से साझेदारी कर उनके लिए बेहतर बाज़ार बनाना चाहिए।

निष्कर्ष:
प्राडा का ₹1.2 लाख का कोल्हापुरी विवाद एक ‘चप्पल’ भर का मामला नहीं है – यह भारत की सांस्कृतिक उदासीनता, दस्तकारी के प्रति उपेक्षा और आत्मगौरव की कमी का प्रतीक बन गया है। अब समय है कि हम अपनी धरोहर को सिर्फ गर्व से न देखें, बल्कि उसे सम्मान और बाज़ार दोनों दें। तभी भविष्य में कोई विदेशी ब्रांड हमारे शिल्प को ‘स्टाइल’ में नहीं, संवेदनशीलता के साथ पेश करेगा।

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