भारत की रक्षा क्षमता को एक और बड़ी सफलता मिली है। DRDO ने देश में ही फाइटर पायलटों की जान बचाने वाली इमरजेंसी इजेक्शन सीट को सफलतापूर्वक टेस्ट कर लिया है। यह वही इजेक्शन सीट है, जिसे अब तक भारत को विदेशों से भारी कीमत पर आयात करना पड़ता था। लेकिन अब घरेलू तकनीक से तैयार यह सिस्टम ‘मेक इन इंडिया’ के तहत देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

हाई-स्पीड रॉकेट-स्लेग टेस्ट सफल
DRDO ने चंडीगढ़ में तेजस फाइटर जेट के लिए बनाई गई इमरजेंसी इजेक्शन सीट का हाई-स्पीड रॉकेट-स्लेग टेस्ट किया। यह टेस्ट बेहद कठिन और हाई-रिस्क होता है, जिसमें सीट की क्षमता, दबाव झेलने की ताकत और पायलट की सुरक्षा का आकलन किया जाता है।
टेस्ट पूरी तरह सफल रहा, जिससे इस स्वदेशी सीट के फाइनल ट्रायल और इंडक्शन का रास्ता साफ हो गया है।
डिफेंस अपडेट्स: Click here
अब नहीं पड़ेगा आयात पर निर्भर रहने की जरूरत
अब तक भारत को इजेक्शन सीटें रूस, ब्रिटेन और अन्य देशों से खरीदनी पड़ती थीं।
एक सीट की कीमत कई करोड़ रुपये तक होती है।
स्वदेशी सीट बनने से—
- लागत में भारी कमी आएगी
- एयर फोर्स की जरूरतें तेजी से पूरी होंगी
- टेक्नोलॉजी का नियंत्रण भारत के हाथ में रहेगा
पायलटों के लिए जीवनरक्षक तकनीक
इजेक्शन सीट एक ऐसा सिस्टम है, जो फाइटर जेट में किसी गंभीर खतरे की स्थिति में सिर्फ 2 सेकंड से भी कम समय में पायलट को सुरक्षित बाहर निकाल देती है।
तेजस जैसे आधुनिक विमान के लिए यह तकनीक बेहद जरूरी है।
DRDO की यह उपलब्धि क्यों बड़ी है?
- भारत अब फाइटर जेट से लेकर उनकी सुरक्षा तकनीक तक, पूर्ण स्वदेशीकरण की ओर बढ़ रहा है
- एयर फोर्स के बेड़े में भविष्य के लड़ाकू विमान—AMCA, TEDBF जैसे प्रोजेक्ट्स—भी इससे लाभान्वित होंगे
- रक्षा निर्यात की राह भी खुल सकती है
