
नीट MBBS एडमिशन को लेकर इस साल बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।
MBBS की कटऑफ इस बार रिकॉर्ड स्तर पर नीचे चली गई है।
कई राज्यों में 118 अंक और 13 लाख से अधिक रैंक वाले छात्रों को भी MBBS सीट मिल गई है।
यह आंकड़ा मेडिकल समुदाय को चौंका रहा है।
विशेषज्ञों ने इसे “असामान्य और चिंताजनक” बताया है।
सोशल मीडिया पर भी एडमिशन प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
यह स्थिति मुख्यतः स्ट्रे-वेकेन्सी राउंड में देखी गई।
इन राउंड में कई सीटें खाली रह गई थीं।
कॉलेजों ने सीटें भरने के लिए बेहद कम अंक वालों को भी प्रवेश दे दिया।
कई राज्यों में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की सीटें अंत तक खाली थीं।
कहा जा रहा है कि फीस ज्यादा होने के कारण योग्य उम्मीदवार पीछे हटे।
इस वजह से कम रैंक वालों के लिए रास्ता खुल गया।
सवाल यह भी उठ रहा है कि इतने कम अंक पर MBBS छात्रों की गुणवत्ता कैसी होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल शिक्षा समझौते की जगह नहीं है।
इससे भविष्य में डॉक्टरों की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
कुछ शिक्षाविदों ने NEET सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।
उनका तर्क है कि कटऑफ गिरने से प्रवेश प्रक्रिया पर भरोसा कम होता है।
वहीं, कुछ लोग इसे “मांग और आपूर्ति के असंतुलन” का नतीजा बता रहे हैं।
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स्टूडेंट कम्युनिटी में भी चर्चा गर्म है।
कई छात्रों का कहना है कि इतने कम नंबरों पर सीट मिलना सिस्टम की खामी दिखाता है।
वहीं कुछ इसे अपनी किस्मत मान रहे हैं।
अब निगाहें मेडिकल काउंसिल और शिक्षा मंत्रालय पर हैं।
क्या कटऑफ गिरावट को रोकने के लिए कोई नया नियम आएगा?
अगले सत्र तक तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।
