बिहार की नई सरकार में उपेंद्र कुशवाहा का बड़ा राजनीतिक दांव पूरी तरह सफल हो गया। गुरुवार को शपथ ग्रहण के दौरान उनके बेटे दीपक प्रकाश RLM को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई।
चौंकाने वाली बात यह है कि दीपक फिलहाल किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। इसके बावजूद उन्हें मंत्री बनाए जाने को कुशवाहा की राजनीतिक रणनीति का बड़ा जीत माना जा रहा है।

उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने इस बार छह सीटों पर चुनाव लड़ा और चार पर जीत दर्ज की। इसके बाद माना जा रहा था कि उनके किसी विजयी विधायक को मंत्री पद मिलेगा।
शपथ से एक दिन पहले तक यह चर्चा थी कि कुशवाहा की पत्नी और सासाराम से विजयी विधायक स्नेहलता को कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है। लेकिन अंतिम समय में समीकरण पूरी तरह बदल गया।
गांधी میدان में शपथ से ठीक पहले यह साफ हो गया कि मंत्री पद स्नेहलता को नहीं, बल्कि दीपक प्रकाश को मिलेगा।
सूत्रों के अनुसार यह पूरा मामला उन नाराज़गियों से जुड़ा है जो सीट बंटवारे के दौरान पैदा हुई थीं। कुशवाहा को चुनाव से पहले महुआ सीट दी गई थी, लेकिन बाद में वह सीट उनसे वापस ले ली गई।
इससे कुशवाहा बेहद नाराज़ हुए थे।
मामला बढ़ा तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हस्तक्षेप किया। शाह और कुशवाहा की दिल्ली में बैठक हुई। वहां यह प्रस्ताव रखा गया कि उनकी पार्टी को एक विधान पार्षद की सीट मिलेगी।
कुशवाहा ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और इसी समझौते के आधार पर उन्होंने बेटे दीपक के लिए मंत्री पद सुनिश्चित किया।
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अब यह लगभग तय है कि दीपक प्रकाश को जल्द ही उच्च सदन में भेजा जाएगा, ताकि छह महीने के भीतर उनकी सदस्यता की शर्त पूरी हो सके।
अपने इस कदम से उपेंद्र कुशवाहा ने एक साथ दो लक्ष्य साध लिए—बेटे को मंत्री पद दिलाया और उच्च सदन की रास्ता भी साफ किया।
यह फैसला बिहार की राजनीति में नई चर्चा छेड़ रहा है।
