पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। पहली बार इतनी सख्त वोटर वेरिफिकेशन शुरू किया गया है, जिसका सीधा असर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सत्ता पर दिखाई दे रहा है। प्रशासन से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस कार्रवाई से बेचैनी साफ दिख रही है।

चुनाव आयोग की इस कार्रवाई का उद्देश्य सिर्फ फर्जी वोटरों को हटाना नहीं है, बल्कि मतदाता सूची को पूरी तरह पारदर्शी बनाना है। कई सालों से जो नाम बिना सत्यापन के सूची में जुड़े हुए थे, वे अब एक-एक कर सामने आ रहे हैं। अवैध प्रविष्टियां, डुप्लीकेट वोटर और संदिग्ध पहचानें तेजी से पकड़ी जा रही हैं।
SIR के चलते कई इलाकों में हजारों नामों की जांच की जा रही है। कई स्थानों पर हटाए जाने वाले वोटरों की संख्या इतनी ज्यादा है कि स्थानीय प्रशासन भी हैरान है। यही बात ममता सरकार के लिए चिंता का कारण बनी हुई है।
2021 चुनाव से पहले भी फर्जी वोटिंग का मुद्दा उठा था, लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद चल रही यह प्रक्रिया बेहद कड़ी है। यही वजह है कि इसे बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा ‘रिवील’ कहा जा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वोटर लिस्ट पूरी तरह साफ होती है, तो राजनीतिक समीकरण बड़े पैमाने पर बदल सकते हैं।
TMC इस अभियान को लेकर लगातार सवाल उठा रही है। पार्टी का दावा है कि बूथ स्तर पर वर्कलोड बहुत ज्यादा है और इसका असर कर्मचारियों पर पड़ रहा है। वहीं, भाजपा इस प्रक्रिया को पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।
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अब नजरें 4 दिसंबर पर टिकी हैं। इसी दिन SIR का अहम चरण पूरा होगा और साफ तस्वीर सामने आएगी कि कितने वोटर सूची से हटे और कितने सत्यापित हुए। राजनीतिक दलों को भी इस दिन का इंतजार है, क्योंकि इसका असर सीधे 2026 विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है।
