झारखंड के बरंगा गांव के गुलशन लोहार का फौलादी जज़्बा सबको प्रभावित कर रहा है। वह जन्म से बिना हाथ हैं, फिर भी बच्चों को पढ़ाते हैं। वे ब्लैकबोर्ड पर पैरों से लिखकर गणित सिखाते हैं।

उनकी प्रेरणा की शुरुआत मां ने उन्हें पैरों से लिखना सिखाकर की थी। फुटपाथ की तरह कठिन रास्तों से गुजरते हुए उन्होंने बीएड और एमएड की पढ़ाई पूरी की। हर रोज़ 65 किलोमीटर ट्रेन से सफ़र कर पढ़ाई करने का अनुभव उन्होंने जीत की कहानी बना लिया है।
गुलशन 2011 से बरंगा उत्क्रमित उच्च विद्यालय में गणित शिक्षक के रूप में संविदा पर पढ़ा रहे हैं। आज भी उन्हें स्थायी सरकारी नौकरी नहीं मिली है, पर वह अपने परिवार के भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके छात्रों का कहना है कि पढ़ने में कभी यह महसूस नहीं होता कि गुलशन सर दिव्यांग हैं।
उन्हें समझाने का तरीका बेहद सरल और दिलचस्प है। सहकर्मी और प्राचार्य भी उनकी मेहनत और प्रतिबद्धता की तारीफ़ करते हैं।
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गांव के लोग उन्हें केवल शिक्षक नहीं मानते, बल्कि प्रेरणा का स्तंभ कहते हैं। कई लोग कहते हैं कि गुलशन की कहानी यह सिखाती है कि मुश्किलें चाहे जितनी भी गहरी हों, लक्ष्य ऊँचा रखकर हर इंसान अपना मुक़ाम पा सकता है। उनकी यह यात्रा समुदाय के लिए प्रेरणा का जागृत स्रोत बन चुकी है।
