महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा को लेकर संसद में बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। मनरेगा की जगह कथित तौर पर ‘जी-राम-जी’ कानून लाने के प्रस्ताव और ‘बापू’ के नाम को हटाने की अटकलों ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। विपक्ष ने सरकार पर महात्मा गांधी की विरासत को कमजोर करने का आरोप लगाया, जबकि सत्ता पक्ष ने इन दावों को भ्रामक बताया।

संसद में चर्चा के दौरान विपक्षी सांसदों ने सवाल उठाया कि क्या सरकार मनरेगा का नाम बदलकर नया कानून लाने की तैयारी में है। उनका कहना था कि महात्मा गांधी का नाम केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण रोजगार और सामाजिक न्याय की पहचान है। इसे हटाना देश के गरीब और ग्रामीण वर्ग की भावनाओं से खिलवाड़ होगा।
इसके साथ ही फंड शेयरिंग को लेकर भी सरकार को घेरा गया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार राज्यों को समय पर फंड नहीं दे रही है, जिससे मनरेगा के तहत मजदूरी भुगतान में देरी हो रही है। कई राज्यों में करोड़ों रुपये का बकाया बताया गया, जिससे ग्रामीण इलाकों में रोजगार संकट गहराने की बात कही गई।
विवाद के बीच सत्ता पक्ष ने स्पष्ट किया कि मनरेगा को खत्म करने या महात्मा गांधी का नाम हटाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। सरकार का कहना है कि ग्रामीण रोजगार योजनाओं को और प्रभावी बनाने के लिए सुधारों पर विचार किया जा रहा है, लेकिन इससे योजना की मूल भावना से कोई समझौता नहीं होगा। सरकार ने यह भी कहा कि फंड आवंटन तय नियमों के तहत किया जा रहा है।
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हालांकि विपक्ष इस जवाब से संतुष्ट नहीं दिखा। सांसदों ने कहा कि नाम बदलने की चर्चा और नए कानून की अटकलें खुद सरकार के बयानों से पैदा हुई हैं। संसद में इस मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिली, जिससे साफ है कि आने वाले दिनों में मनरेगा राजनीति का बड़ा मुद्दा बना रहेगा।
ग्रामीण भारत में करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ी इस योजना को लेकर उठे सवाल सरकार और विपक्ष के बीच टकराव को और तेज कर सकते हैं। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार इस विवाद को शांत करने के लिए क्या आधिकारिक कदम उठाती है।
