कोलकाता, 26 जून 2025 — पश्चिम बंगाल में ओबीसी की नई सूची को लेकर राजनीतिक और कानूनी संघर्ष तेज हो गया है। कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार की नई ओबीसी सूची पर अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद ममता बनर्जी सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अंतरिम आदेश में 2010 के बाद राज्य सरकार द्वारा जारी की गई ओबीसी सूची को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि इस प्रक्रिया में अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ और जातियों की पहचान वैज्ञानिक तरीके से नहीं की गई। यह आदेश तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, खासकर जब पंचायत चुनावों से पहले ओबीसी समुदाय को साधने की कोशिश की जा रही थी।

राज्य सरकार ने अब इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और अपील की है कि हाईकोर्ट के आदेश को तत्काल प्रभाव से स्थगित किया जाए। बंगाल सरकार का तर्क है कि यह निर्णय सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को बाधित करता है और लाखों लोगों को प्रभावित कर सकता है।
राज्य सरकार का पक्ष:
सरकारी वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाईकोर्ट ने बिना पर्याप्त तथ्यात्मक सुनवाई के यह आदेश दिया है, जिससे सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण के उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
विपक्ष का आरोप:
वहीं विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का आरोप है कि तृणमूल सरकार ने चुनावी लाभ के लिए ओबीसी सूची में जातियों को बिना ठोस सर्वे के शामिल किया, जो संविधान के खिलाफ है। भाजपा नेताओं ने इसे “आरक्षण की राजनीति” बताते हुए चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की मांग भी की है।
समाजशास्त्रियों की राय:
कई सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि ओबीसी आरक्षण के दायरे में आने वाली जातियों की वैज्ञानिक पहचान और निष्पक्ष प्रक्रिया बेहद जरूरी है। यदि ओबीसी की सूची को राजनीति से प्रेरित कर दिया गया तो इससे अन्य सामाजिक समूहों के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है।
क्या है मामला:
2010 के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने करीब 77 जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि इस प्रक्रिया में जातिगत जनगणना या सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण नहीं किया गया, जिससे सूची की वैधता पर सवाल उठे।
अब सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद की जा रही है कि वह जल्द सुनवाई कर यह तय करेगा कि हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा या राज्य सरकार को राहत दी जाएगी।
